यहाँ माहे-रमज़ान के मुकद्दर और रूहानी महीने के लिए का एक बेहद पावन, गहरा और अनोखा शायरी कलेक्शन है। इसमें रहमत, मगफिरत (माफी), सहरी, इफ़्तारी, रातों की इबादत और खुदा की बंदगी के हर खूबसूरत रंग शामिल हैं। इसे आप रमज़ान के मुकद्दस महीने में अपने दोस्तों, अज़ीज़ों और सोशल मीडिया पर शेयर कर सकते हैं।
आसमां पर नूर का साया छा गया है,
देखो हर तरफ बरकतों का महीना आ गया है,
झुका लो सिर खुदा की बारगाह में 'अदनान',
क्योंकि गुनाहों की माफ़ी का रमज़ान आ गया है।
रमज़ान मुबारक!
बरकतों की बहार लेकर आया है यह महीना,
हर मोमिन के दिल को सुकूँ सिखाने आया है यह महीना,
रहमत के दरवाज़े खोल दिए हैं रब्त-ए-करीम ने,
देखो जन्नत की खुशबू संग लाया है यह महीना।
इबादत से रोशन हर एक रात होगी,
खुदा के बंदों पर उसकी इनायत की बरसात होगी,
खोल दो दिल के दरवाज़े नफ़रतों को मिटाकर,
इस रमज़ान हर दुआ मुकम्मल और ख़ास होगी।
चाँद को देखा तो दिल से ये दुआ निकली,
कि इस बार हर घर से सिर्फ खुशहाली की राह निकली,
बच जाएं सब इस जहान में हर बला और बीमारी से,
माहे-रमज़ान की हर घड़ी ऐसी पाक और साफ निकली।
सहरी की वो ठंडी हवा और अज़ान की गूंज,
हाथों में खजूर और दिल में खुदा की गूंज,
कितना खुशनुमा होता है वो समां भी यारों,
जब बंदा बैठा हो दस्तरख्वान पर लेकर इफ़्तारी की गूंज।
नींद को छोड़ कर जो सहरी में उठ जाते हैं,
वो खुदा के सबसे चहेते बंदे कहलाते हैं,
फ़रिश्ते भी दुआ करते हैं उनके हक में दिन भर,
जो रब की रज़ा के लिए भूख और प्यास सह जाते हैं।
इफ़्तार के वक्त की वो दुआ कभी खाली नहीं जाती,
बंदे की आँखों की नमी कभी बेकार नहीं जाती,
मांग लो जो कुछ मांगना है आज उस परवरदिगार से,
क्योंकि उसकी रहमत कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाती।
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खजूर की मिठास और पानी का वो पहला घूंट,
मिटा देता है दिन भर की थकान का हर एक ऊंट,
शुक्र करो उस मालिक का जिसने ये नियम बनाया,
इफ़्तारी के इस मंज़र में छुपा है जन्नत का अटूट रूप।

मस्जिदें आबाद हैं, कुरान की तिलावत जारी है,
गुनाहों से तौबा करने की अब हमारी बारी है,
तरावीह की हर एक रकात में जो सुकूँ मिलता है,
लगता है जैसे रूह पर खुदा की रहमत सारी है।
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सजदे में रो कर जो दिल को साफ करते हैं,
खुदा उनके बड़े से बड़े गुनाह भी माफ करते हैं,
ये रातें नहीं हैं सोने के लिए मेरे अज़ीज़ों,
ये वो घड़ियाँ हैं जिसमें मुक़द्दर के फैसले साफ़ होते हैं।
आँसू बहाओ उसकी याद में रात के अंधेरे में,
बड़ा असर होता है तौबा के इन सवेरे में,
वो सत्तर माताओं से भी ज़्यादा प्यार करता है हमसे,
तभी तो पुकारता है हमें रहमत के इस घेरे में।
कुरान की आयतें जब कानों में रस घोलती हैं,
दिल की बंद खिड़कियां अपने आप ही खुलती हैं,
रमज़ान की रातों का ये आलम बयां कैसे करूँ,
धरती तो क्या, आसमां की रूह भी डोलती है।
ऐ खुदा! मेरे गुनाह चाहे समंदर के झाग जितने हों,
पर तेरी रहमत के आगे वो सब कुछ भी नहीं,
इस पावन महीने में मेरी तौबा को कबूल कर ले,
क्योंकि तेरे सिवा मेरा इस दुनिया में कोई भी नहीं।
गुनाहों की आदत ने दिल को स्याह कर दिया था,
ज़िंदगी के सीधे रास्ते को गुमराह कर दिया था,
शुक्र है तेरा कि तूने फिर से रमज़ान दिखा दिया,
जिसने मेरी रूह को फिर से पाक-साफ कर दिया।
रो लो आज अपनी खताओं पर जितना रोया जाए,
ऐसा न हो कि रहमत का यह साल भी सो कर खोया जाए,
माफ़ी के दरवाज़े खुले हैं इस दूसरे अश्ते में,
चलो अपने दिल के मैल को आँसुओं से धोया जाए।
वो गफ़ूर है, रहीम है, हर ऐब को छुपाता है,
बंदा जब थक कर हारता है, तो वही याद आता है,
रमज़ान का यह महीना तो बस एक ज़रिया है,
वरना वो तो हर पल हमें अपने गले से लगाता है।
स्टेटस बदलने से पहले अपने दिल की नीयत को बदलें,
दिखावे की इबादत से अच्छा है कि किसी ग़रीब की भूख बदलें,
इस डिजिटल दौर में भी जो सादगी रखे अपने रोज़े में,
खुदा कसम! उसी के हक में जन्नत के सितारे चलते हैं।
वॉट्सऐप के नोटिफिकेशन से ज़्यादा अज़ान की फिक्र हो,
ज़ुबान पर गानों की जगह सिर्फ अल्लाह का ज़िक्र हो,
ऐसा खूबसूरत गुज़रे यह माहे-रमज़ान आपका,
कि आपकी तक़दीर में खुशियों का ही हर चित्र हो।
रील्स और वीडियो से दूरी बनाना भी एक जिहाद है,
असली मज़ा तो मुसल्ले पर बैठकर खुदा की याद है,
चलो इस रमज़ान अपने वक्त को 'रीबूट' करते हैं,
और गुनाहों के हर एक 'वायरस' को डिलीट करते हैं।
गूगल पर नहीं मिलेगा जो सुकूँ इस महीने की रातों में है,
वो ताकत कहाँ दुनिया में जो माँ की सहरी की दुआओं में है,
घर के आँगन को नमाज़ों से सजा कर तो देखो,
असली जन्नत का नज़ारा तो बस इबादत की बाज़ुओं में है।
देखते ही देखते रहमत का महीना गुज़र रहा है,
दिल उदास है और आँखें नम, क्योंकि रमज़ान रुख़सत हो रहा है,
न जाने अगले साल हम इस लायक होंगे या नहीं,
अलविदा माहे-रमज़ान का दर्द हर दिल में उतर रहा है।
सहरी की रौनकें और इफ़्तारी की वो महफ़िलें,
अब याद आएंगी वो मस्जिद की ठंडी दीवारें और सफ़ें,
अलविदा कह रहे हैं तुमको भारी दिल से मेरे महमां,
जाते-जाते हमारी झोली में खुशियों की दुआएँ भर दें।
गुनाहगार थे हम, तूने हमें पाकीज़गी का सलीका सिखाया,
भटके हुए थे राह से, तूने हमें सजदों का रास्ता दिखाया,
ऐ माहे-रमज़ान! तेरी जुदाई का गम कैसे सहेंगे हम,
तूने ही तो गिरते हुए इंसानों को खुदा से मिलाया।
रुख़सत हो रहा है तू हमसे, पर एक वादा निभाना,
अगले साल फिर से हमारे घरों में खुशियाँ लेकर आना,
जितनी इबादतें की हैं हमने इस पाक महीने में,
उन सबको रोज़-ए-महशर में हमारी बख्शिश का ज़रिया बनाना।
दिलों में नूर, आँखों में सादगी का वास रहे,
आपके घर में हमेशा कुरान की मिठास रहे,
रमज़ान का यह महीना देकर जाए आपको इतनी खुशियाँ,
कि आने वाले ग्यारह महीने भी आपका दिल रब के पास रहे।
मुकद्दर का सबसे खूबसूरत पन्ना खुल जाए आपका,
जो दुआ मांगो इस महीने में वो सच हो जाए आपका,
परवरदिगार से बस यही मन्नत है हमारी आपके लिए,
कि जन्नत की हर एक नेमत पर नाम लिखा हो आपका।
नफ़रतों की दीवारों को गिराकर प्यार का चराग़ जलाएँ,
चलो इस रमज़ान हम सब मिलकर इंसानियत का फ़र्ज़ निभाएँ,
सिर्फ खुद के लिए नहीं, दूसरों के हक में भी हाथ उठाएँ,
यही तो है असली रोज़ा, चलो इसे सच्चे दिल से मनाएँ।
चमकता रहे तक़दीर का सितारा आपका सदा,
कभी न रूठे आपसे आपका वो प्यारा खुदा,
माहे-रमज़ान की इन मुकद्दर घड़ियों के सदके में,
हर गम और परेशानी आपसे हमेशा के लिए हो जाए जुदा।
रमज़ानुल मुबारक की पुरख़ुलूस मुबारकबाद!
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